बदलते जल संसाधन और कृषि विकास की चुनौतियाँ: नालन्दा जिला का भौगोलिक विश्लेषण
Keywords:
जल संसाधन, कृषि विकास, भूजल दोहन, सिंचाई, जल प्रबंधन, नालन्दा जिला, कृषि स्थिरता, वर्षा जल संचयनAbstract
जल संसाधन कृषि विकास एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला माने जाते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जल की उपलब्धता कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा तथा सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। प्रस्तुत शोध पत्र “बदलते जल संसाधन और कृषि विकास की चुनौतियाँ : नालन्दा जिला का भौगोलिक विश्लेषण” में बिहार के नालन्दा जिले में जल संसाधनों की वर्तमान स्थिति, कृषि विकास पर उनके प्रभाव तथा जल प्रबंधन संबंधी चुनौतियों का भौगोलिक अध्ययन किया गया है। अध्ययन में वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति का उपयोग किया गया है। शोध हेतु द्वितीयक आँकड़े केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB), बिहार आर्थिक सर्वेक्षण, कृषि विभाग, जल संसाधन विभाग एवं जनगणना रिपोर्टों से प्राप्त किए गए हैं। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय अवलोकन, मानचित्रों एवं सांख्यिकीय विश्लेषण का भी उपयोग किया गया है। नालन्दा जिले की कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा एवं भूजल आधारित सिंचाई पर निर्भर है। अनियमित मानसून, वर्षा की असमानता, भूजल के अत्यधिक दोहन एवं पारंपरिक जल स्रोतों के क्षरण के कारण कृषि क्षेत्र अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। जिले में निजी नलकूप एवं बोरवेल आधारित सिंचाई प्रणाली के विस्तार से कृषि उत्पादन एवं बहुफसली कृषि को बढ़ावा मिला है, किन्तु इसके परिणामस्वरूप भूजल स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सिंचाई सुविधाओं की क्षेत्रीय असमानता कृषि उत्पादकता एवं किसानों की आय को प्रभावित करती है। शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि जल संसाधनों का उचित एवं वैज्ञानिक प्रबंधन कृषि विकास की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। वर्षा जल संचयन, आहर-पईन एवं तालाबों का पुनर्जीवन, ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों का विस्तार तथा भूजल पुनर्भरण की योजनाएँ जल संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। अध्ययन में बिहार सरकार द्वारा संचालित “जल-जीवन-हरियाली अभियान” एवं अन्य सिंचाई योजनाओं की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला गया है।
